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यज्ञ अवतार की कथा – स्वायंभुव मनु के समय
बहुत समय पहले, जब यह संसार नया-नया बना था, तब स्वायंभुव मनु का शासन था। वे पहले मनु थे, जिन्हें ब्रह्मा जी ने इस पृथ्वी पर मानव जाति के कल्याण के लिए भेजा था। उस समय धरती पर शांति और धर्म का राज था।
स्वायंभुव मनु बहुत धर्मपरायण राजा थे। वे नियमित रूप से यज्ञ करते थे और प्रजा को भी यज्ञ करने के लिए प्रेरित करते थे। उनके राज्य में हर दिन कहीं न कहीं यज्ञ की पवित्र अग्नि जलती रहती थी।
“हे प्रजाजनों!” मनु जी कहते थे, “यज्ञ से ही देवताओं को प्रसन्न करके हम वर्षा, अन्न और समृद्धि पा सकते हैं। यज्ञ हमारे जीवन का आधार है।”
लेकिन जहाँ धर्म होता है, वहाँ अधर्म भी अपना सिर उठाने की कोशिश करता है। उस समय हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नाम के दो शक्तिशाली असुर भाई थे। वे दोनों भगवान विष्णु के घोर शत्रु थे।
हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में छुपा दिया था, जिसे भगवान ने वराह अवतार लेकर बचाया था। अब हिरण्यकशिपु का समय था। वह अपने भाई की मृत्यु का बदला लेना चाहता था।
“मैं सभी यज्ञों को नष्ट कर दूंगा!” हिरण्यकशिपु गर्जना करता था। “जब तक यज्ञ होते रहेंगे, देवता शक्तिशाली बने रहेंगे। मुझे सभी यज्ञों को रोकना होगा।”
हिरण्यकशिपु ने अपनी विशाल असुर सेना के साथ पृथ्वी पर आक्रमण कर दिया। वह जहाँ भी जाता, यज्ञशालाओं को नष्ट कर देता। यज्ञ की पवित्र अग्नि को बुझा देता और ऋषि-मुनियों को परेशान करता।
स्वायंभुव मनु बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने देखा कि उनके राज्य में एक के बाद एक यज्ञ रुकते जा रहे हैं। प्रजा डरी हुई थी और देवता भी कमजोर होते जा रहे थे।
“हे भगवान विष्णु!” मनु जी ने प्रार्थना की। “आप ही हमारी रक्षा कर सकते हैं। यज्ञों की रक्षा के बिना धर्म का नाश हो जाएगा।”
भगवान विष्णु ने मनु जी की पुकार सुनी। वे समझ गए कि यज्ञों की रक्षा के लिए उन्हें एक विशेष अवतार लेना होगा। इस प्रकार भगवान ने यज्ञ अवतार का रूप धारण किया।
यज्ञ अवतार का रूप अत्यंत तेजस्वी और दिव्य था। उनके शरीर से यज्ञ की पवित्र ज्योति निकलती थी। उनके हाथों में यज्ञ के सभी उपकरण थे – श्रुवा, स्रुक, और पवित्र कमंडल।
जब यज्ञ अवतार प्रकट हुए, तो पूरा आकाश तेज से भर गया। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और गंधर्वों ने मधुर संगीत बजाया।
“मैं यज्ञ अवतार हूँ,” भगवान ने घोषणा की। “मैं सभी यज्ञों की रक्षा करूंगा और धर्म की स्थापना करूंगा।”
यज्ञ अवतार ने सबसे पहले एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। यह यज्ञ इतना शक्तिशाली था कि इसकी ज्योति तीनों लोकों में फैल गई। इस यज्ञ से निकलने वाली शक्ति से सभी देवता पुनः बलवान हो गए।
हिरण्यकशिपु को जब इस महान यज्ञ का पता चला, तो वह क्रोध से भर गया। “कौन है यह, जो मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है?” वह गर्जना करता हुआ यज्ञस्थल की ओर चला।
जब हिरण्यकशिपु यज्ञस्थल पहुंचा, तो उसने देखा कि वहाँ एक दिव्य पुरुष यज्ञ कर रहे हैं। उनके चारों ओर तेज का मंडल था और यज्ञ की अग्नि आकाश तक जा रही थी।
“रुको!” हिरण्यकशिपु चिल्लाया। “मैंने सभी यज्ञों पर रोक लगाई है। तुम कौन हो जो मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो?”
यज्ञ अवतार ने शांति से उत्तर दिया, “मैं यज्ञ का स्वरूप हूँ। यज्ञ को रोकना असंभव है क्योंकि यज्ञ ही जीवन का आधार है।”
“तो फिर मैं तुम्हें नष्ट कर दूंगा!” हिरण्यकशिपु ने अपनी गदा उठाई और यज्ञ अवतार पर आक्रमण कर दिया।
लेकिन यज्ञ अवतार के सामने हिरण्यकशिपु की शक्ति कुछ भी नहीं थी। यज्ञ की पवित्र अग्नि से निकलने वाली ज्योति ने हिरण्यकशिपु को वापस धकेल दिया।
“तुम समझ नहीं रहे हो, हिरण्यकशिपु,” यज्ञ अवतार ने कहा। “यज्ञ केवल एक क्रिया नहीं है, यह सृष्टि का नियम है। सूर्य का प्रकाश देना, वृक्षों का फल देना, नदियों का बहना – यह सब यज्ञ ही है।”
यज्ञ अवतार ने अपनी दिव्य शक्ति से हिरण्यकशिपु को दिखाया कि कैसे पूरी प्रकृति यज्ञ के सिद्धांत पर चलती है। सूर्य अपना तेज देकर यज्ञ करता है, चंद्रमा अपनी शीतलता देकर यज्ञ करता है।
हिरण्यकशिपु समझ गया कि वह यज्ञ के मूल सिद्धांत से लड़ रहा है, जो असंभव है। लेकिन अहंकार में अंधा होकर वह फिर भी लड़ता रहा।
यज्ञ अवतार ने हिरण्यकशिपु को पराजित किया और उसे चेतावनी दी कि यदि वह फिर से यज्ञों में बाधा डालेगा, तो उसका विनाश निश्चित है।
इसके बाद यज्ञ अवतार ने पूरी पृथ्वी पर घूमकर सभी नष्ट हुई यज्ञशालाओं को पुनः स्थापित किया। उन्होंने ऋषि-मुनियों को यज्ञ की नई विधियाँ सिखाईं और यज्ञों की रक्षा के लिए दिव्य शक्तियाँ प्रदान कीं।
स्वायंभुव मनु बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञ अवतार की स्तुति की और कहा, “हे प्रभु! आपने यज्ञों की रक्षा करके धर्म की रक्षा की है। अब हमारी प्रजा फिर से खुशी से यज्ञ कर सकेगी।”
यज्ञ अवतार ने मनु जी को आशीर्वाद दिया और कहा, “हे मनु! जब तक तुम्हारे राज्य में यज्ञ होते रहेंगे, तब तक यहाँ शांति और समृद्धि रहेगी। यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, बल्कि निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करना भी यज्ञ है।”
इस प्रकार यज्ञ अवतार की कथा से हमें सिखने को मिलता है कि यज्ञ का अर्थ केवल हवन करना नहीं है। माता-पिता का अपने बच्चों के लिए त्याग करना, शिक्षक का विद्यार्थियों को ज्ञान देना, डॉक्टर का मरीजों की सेवा करना – यह सब यज्ञ ही है।
यज्ञ अवतार ने दिखाया कि जब हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई करते हैं, तो वह सबसे बड़ा यज्ञ होता है। इससे न केवल हमारा कल्याण होता है, बल्कि पूरे समाज का कल्याण होता है।
स्वायंभुव मनु के समय से लेकर आज तक, यज्ञ की यह परंपरा चलती आ रही है। हर त्योहार में, हर शुभ कार्य में हम यज्ञ करते हैं और भगवान से सबके कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
यज्ञ अवतार की कथा हमें सिखाती है कि धर्म और यज्ञ की शक्ति अजेय है। जो भी व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलता है और निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करता है, भगवान उसकी सदा रक्षा करते हैं।












