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सर्वश्रेष्ठ वर कौन – बेताल पच्चीसी की नवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए जा रहे थे। रात का समय था और जंगल में सन्नाटा छाया हुआ था। तभी बेताल ने अपनी कर्कश आवाज़ में कहा, “राजन्! आज मैं तुम्हें एक और कहानी सुनाता हूँ। सुनो और बताओ कि सर्वश्रेष्ठ वर कौन था?”

विक्रम ने मन ही मन सोचा कि फिर से बेताल की पहेली का सामना करना पड़ेगा, लेकिन वे चुपचाप सुनते रहे।

बेताल ने कहानी शुरू की – “कल्याणपुर नगर में राजा चंद्रगुप्त का राज था। उनकी एक अत्यंत सुंदर और गुणवान कन्या थी जिसका नाम सुनंदा था। राजकुमारी सुनंदा केवल रूप में ही नहीं, बल्कि बुद्धि, कला और धर्म में भी निपुण थी।”

जब सुनंदा के विवाह का समय आया, तो तीन राजकुमार उसके स्वयंवर में आए। पहला राजकुमार था अर्जुन, जो महान योद्धा था और युद्ध कला में अद्वितीय था। दूसरा था विद्यानंद, जो सभी शास्त्रों का ज्ञाता और महान विद्वान था। तीसरा था धर्मराज, जो अत्यंत दानवीर और धर्मपरायण था।

स्वयंवर के दिन तीनों राजकुमारों ने अपने-अपने गुणों का प्रदर्शन किया। अर्जुन ने अपनी तलवार से हवा में उड़ते पंछी के पंख को बिना उसे नुकसान पहुंचाए काट दिया। विद्यानंद ने कठिन से कठिन प्रश्नों के उत्तर दिए और अपनी विद्वता का परिचय दिया। धर्मराज ने घोषणा की कि वह अपना आधा राज्य गरीबों में बांट देगा।

राजकुमारी सुनंदा तीनों के गुणों से प्रभावित थी लेकिन निर्णय नहीं ले पा रही थी। तभी एक अजीब घटना घटी।

अचानक आकाश से एक दिव्य आवाज़ आई“हे राजकुमारी! तुम्हारे सामने एक कठिन परीक्षा है। तुम्हारे पिता राजा चंद्रगुप्त को एक राक्षस ने बंदी बना लिया है। जो भी राजकुमार उन्हें बचाएगा, वही तुम्हारा पति बनने का अधिकारी होगा।”

यह सुनकर तीनों राजकुमार तुरंत राजा को बचाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्हें पता चला कि राक्षस एक गुफा में राजा को बंदी बनाकर रखा है।

जब वे गुफा के पास पहुंचे तो देखा कि राक्षस बहुत शक्तिशाली था। अर्जुन ने अपनी वीरता दिखाते हुए राक्षस से युद्ध किया और उसे हराया। विद्यानंद ने अपने ज्ञान से राजा की बेड़ियों को खोला। धर्मराज ने अपनी दया से राजा के घावों की सेवा की और उन्हें स्वस्थ किया।

जब वे सभी वापस राजमहल पहुंचे तो राजा चंद्रगुप्त ने तीनों राजकुमारों का धन्यवाद किया। अब सवाल यह था कि सर्वश्रेष्ठ वर कौन है?

राजकुमारी सुनंदा ने कहा – “अर्जुन ने अपनी वीरता से राक्षस को हराया, विद्यानंद ने अपने ज्ञान से पिताजी को मुक्त कराया, और धर्मराज ने अपनी सेवा से उन्हें स्वस्थ किया। तीनों ने मिलकर पिताजी को बचाया है।”

लेकिन विवाह तो एक से ही हो सकता था। राजकुमारी ने एक अनोखा निर्णय लिया। उसने कहा कि वह उससे विवाह करेगी जो सबसे पहले अपना त्याग करे।

तभी धर्मराज ने कहा – “राजकुमारी! मैं अपना दावा छोड़ता हूँ। अर्जुन और विद्यानंद दोनों मुझसे अधिक योग्य हैं।” यह सुनकर विद्यानंद ने भी कहा – “नहीं, अर्जुन सबसे योग्य है।” लेकिन अर्जुन ने कहा – “धर्मराज का त्याग सबसे महान है।”

राजकुमारी सुनंदा ने धर्मराज का हाथ थाम लिया और कहा – “जो व्यक्ति अपनी खुशी दूसरों के लिए त्याग सकता है, वही सच्चा पति बनने का अधिकारी है।”

इस प्रकार धर्मराज और सुनंदा का विवाह हुआ। सभी ने इस निर्णय की प्रशंसा की।

बेताल ने कहानी समाप्त करके पूछा – “राजा विक्रम! बताओ, सर्वश्रेष्ठ वर कौन था और क्यों?”

विक्रम ने उत्तर दिया – “बेताल! धर्मराज सर्वश्रेष्ठ वर था क्योंकि उसमें सच्चा त्याग था। वीरता और विद्या तो अहंकार भी ला सकते हैं, लेकिन त्याग और परोपकार ही व्यक्ति को महान बनाते हैं।”

यह सुनते ही बेताल फिर से पेड़ पर जा लटका और विक्रम को फिर से उसे लाने जाना पड़ा।

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि सच्चा प्रेम और त्याग ही जीवन में सबसे बड़े गुण हैं।

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