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चतुर लोमड़ी और मीठे अंगूर की कहानी
एक समय की बात है, घने जंगल के किनारे एक सुंदर बगीचा था। इस बगीचे में तरह-तरह के फल-फूल लगे हुए थे। बगीचे के बीचों-बीच एक ऊंची बेल पर रसीले अंगूर लटक रहे थे। ये अंगूर इतने मीठे और सुंदर थे कि देखने वाला हर कोई उन्हें खाने की इच्छा करता था।
उसी जंगल में गिन्नी नाम की एक चतुर लोमड़ी रहती थी। गिन्नी बहुत ही बुद्धिमान और चालाक थी। वह हमेशा आसान तरीके खोजती रहती थी। एक दिन भोजन की तलाश में घूमते-घूमते वह उस बगीचे के पास पहुंची।
बगीचे में घुसते ही गिन्नी की नजर उन सुनहरे अंगूरों पर पड़ी। “वाह! कितने सुंदर और रसीले अंगूर हैं!” वह मन ही मन बोली। “ये जरूर बहुत मीठे होंगे। मुझे इन्हें जरूर खाना चाहिए।”
लोमड़ी ने पहले सोचा कि वह आसानी से कूदकर अंगूर तक पहुंच जाएगी। उसने एक जोरदार छलांग लगाई, लेकिन अंगूर बहुत ऊंचे थे। वह उन तक नहीं पहुंच सकी। गिन्नी ने सोचा, “कोई बात नहीं, मैं और जोर से कूदूंगी।”
गिन्नी ने दूसरी बार और भी जोर से छलांग लगाई। इस बार भी वह असफल रही। अंगूर अभी भी उसकी पहुंच से बाहर थे। अब तक वह थक गई थी, लेकिन हार मानने को तैयार नहीं थी।
“मैं एक चतुर लोमड़ी हूं,” गिन्नी ने खुद से कहा। “मुझे कोई न कोई तरीका जरूर मिलेगा।” उसने इधर-उधर देखा और एक पुराना लकड़ी का टुकड़ा देखा। उसने सोचा कि इसे सहारा बनाकर वह अंगूरों तक पहुंच सकती है।
गिन्नी ने लकड़ी को बेल के नीचे रखा और उस पर चढ़ने की कोशिश की। लेकिन लकड़ी पुरानी और कमजोर थी। जैसे ही वह उस पर चढ़ी, लकड़ी टूट गई और वह नीचे गिर पड़ी।
अब लोमड़ी परेशान हो गई। उसने एक और तरीका सोचा। पास में एक पत्थर देखकर उसने सोचा कि वह उसे अंगूरों पर फेंककर उन्हें गिरा देगी। लेकिन जब उसने पत्थर फेंका, तो वह अंगूरों से दूर जाकर गिरा।
गिन्नी ने कई और तरीके आजमाए। उसने दौड़कर छलांग लगाई, बेल को हिलाने की कोशिश की, और यहां तक कि दूसरे जानवरों से मदद मांगने के बारे में भी सोचा। लेकिन कुछ भी काम नहीं आया।
आखिरकार, कई घंटों की कोशिश के बाद, गिन्नी बिल्कुल थक गई। उसकी सारी ताकत खत्म हो गई थी। वह हांफते हुए बेल के नीचे बैठ गई और उन अंगूरों को देखने लगी जो अभी भी उसकी पहुंच से बाहर थे।
तभी गिन्नी के मन में एक विचार आया। वह खड़ी हुई और जोर से बोली, “अरे! ये अंगूर तो खट्टे हैं! मैं इन्हें क्यों खाऊं? मुझे तो पहले से ही पता था कि ये स्वादिष्ट नहीं होंगे। अच्छा हुआ कि मैंने इन्हें नहीं खाया।”
यह कहकर लोमड़ी गर्व से सिर उठाकर वहां से चली गई। लेकिन उसके मन में वे मीठे अंगूर अभी भी याद थे।
पास के पेड़ पर बैठा एक बुजुर्ग तोता यह सब देख रहा था। वह समझ गया था कि लोमड़ी ने सच नहीं कहा था। तोते ने मन में सोचा, “गिन्नी ने अपनी असफलता को छुपाने के लिए अंगूरों को खट्टा कह दिया।”
सीख: जब हम किसी चीज को पाने में असफल हो जाते हैं, तो हमें उसे बुरा नहीं कहना चाहिए। असफलता से सीखना चाहिए और दोबारा कोशिश करनी चाहिए। अपनी कमियों को स्वीकार करना बुराई नहीं है, बल्कि यह हमें बेहतर बनने में मदद करता है। जैसे लोमड़ी और अंगूर की इस कहानी से हमें पता चलता है कि हार मानकर बहाने बनाना सही नहीं है।
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