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माँ-बेटी के बच्चों का रिश्ता – बेताल पच्चीसी की चौबीसवीं कहानी
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए जा रहे थे। रात का समय था और जंगल में सन्नाटा छाया हुआ था। तभी बेताल ने अपनी कर्कश आवाज़ में कहा, “राजन्! आज मैं तुम्हें एक अनोखी कहानी सुनाता हूँ। सुनो और बताओ कि माँ-बेटी के बच्चों में क्या रिश्ता हुआ?”
विक्रम चुपचाप सुनने लगे।
बेताल ने कहानी शुरू की – “बहुत समय पहले की बात है। कल्याणपुर नामक नगर में राजा चंद्रगुप्त राज करते थे। उनकी रानी का नाम सुमित्रा था। रानी सुमित्रा की एक सुंदर बेटी थी जिसका नाम प्रिया था।”
प्रिया जब सोलह वर्ष की हुई तो उसका विवाह पास के राज्य के राजकुमार अर्जुन से हुआ। विवाह के बाद प्रिया अपने पति के साथ खुशी से रहने लगी। कुछ समय बाद प्रिया के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया देवदत्त।
इधर रानी सुमित्रा भी अपने महल में खुश थी। राजा चंद्रगुप्त की मृत्यु के बाद वह अकेली रह गई थी। एक दिन एक ब्राह्मण ने उससे कहा कि यदि वह किसी योग्य पुरुष से विवाह कर ले तो उसे एक पुत्र की प्राप्ति होगी।
रानी सुमित्रा ने सोचा और फिर एक विद्वान ब्राह्मण विष्णुदत्त से विवाह कर लिया। कुछ महीनों बाद उसके भी एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया शिवदत्त।
अब स्थिति यह थी कि प्रिया का पुत्र देवदत्त और सुमित्रा का पुत्र शिवदत्त – दोनों लगभग एक ही समय पैदा हुए थे। देवदत्त प्रिया का पुत्र था और प्रिया सुमित्रा की बेटी थी। शिवदत्त सुमित्रा का पुत्र था।
“समय बीतता गया और दोनों बच्चे बड़े होने लगे। जब वे दस वर्ष के हुए तो एक दिन दोनों खेलते समय मिले।”
देवदत्त ने शिवदत्त से कहा, “तुम कौन हो? मैं तुम्हें पहले कभी नहीं मिला।”
शिवदत्त ने उत्तर दिया, “मैं रानी सुमित्रा का पुत्र शिवदत्त हूँ। और तुम कौन हो?”
देवदत्त बोला, “मैं राजकुमारी प्रिया का पुत्र देवदत्त हूँ। प्रिया रानी सुमित्रा की बेटी है।”
दोनों बच्चे सोच में पड़ गए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनके बीच क्या रिश्ता है। देवदत्त की माँ प्रिया, सुमित्रा की बेटी थी। और शिवदत्त सुमित्रा का पुत्र था।
दोनों बच्चे अपने-अपने घर गए और अपनी माताओं से पूछा। प्रिया ने देवदत्त को समझाया कि शिवदत्त उसका मामा है क्योंकि वह उसकी नानी सुमित्रा का पुत्र है।
वहीं सुमित्रा ने शिवदत्त को बताया कि देवदत्त उसका भांजा है क्योंकि वह उसकी बहन प्रिया का पुत्र है।
“लेकिन यहाँ एक अजीब बात थी। दोनों बच्चे लगभग एक ही उम्र के थे। एक मामा था और दूसरा भांजा, लेकिन दोनों की उम्र बराबर थी।”
जब दोनों बच्चे फिर मिले तो देवदत्त ने कहा, “शिवदत्त, तुम मेरे मामा हो लेकिन हम दोनों की उम्र बराबर है। यह कैसे हो सकता है?”
शिवदत्त हंसते हुए बोला, “हाँ देवदत्त, तुम मेरे भांजे हो लेकिन मुझसे छोटे नहीं हो। यह वास्तव में अजीब है।”
दोनों बच्चे इस बात को लेकर हैरान थे। गाँव के बुजुर्गों ने भी इस अनोखे रिश्ते के बारे में सुना तो वे भी आश्चर्य में पड़ गए।
एक दिन एक विद्वान पंडित गाँव आया। उसने इस पूरी कहानी को सुना और मुस्कराते हुए कहा, “यह प्रकृति का एक अनोखा खेल है। कभी-कभी ऐसा होता है कि मामा-भांजे की उम्र बराबर हो जाती है।”
बेताल ने कहानी समाप्त करते हुए कहा, “राजा विक्रमादित्य! अब बताओ कि माँ-बेटी के बच्चों में क्या रिश्ता हुआ? देवदत्त और शिवदत्त के बीच सही रिश्ता क्या था?”
विक्रम ने सोचा और फिर उत्तर दिया, “बेताल! यह स्पष्ट है। देवदत्त प्रिया का पुत्र था और प्रिया सुमित्रा की बेटी थी। शिवदत्त सुमित्रा का पुत्र था। इसलिए शिवदत्त देवदत्त का मामा था और देवदत्त शिवदत्त का भांजा था। भले ही दोनों की उम्र बराबर हो, लेकिन रिश्ता यही था।”
“सही उत्तर दिया राजन्!” बेताल बोला और हवा में गायब हो गया।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि रिश्ते उम्र से नहीं बल्कि पारिवारिक संबंधों से तय होते हैं। हमें अपने सभी रिश्तेदारों का सम्मान करना चाहिए, चाहे वे हमसे छोटे हों या बड़े।













