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सिंहिका राक्षसी का वध – हनुमान जी की वीरता

बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान राम के प्रिय भक्त हनुमान जी लंका की खोज में समुद्र पार कर रहे थे। उस समय समुद्र में एक भयानक राक्षसी रहती थी जिसका नाम सिंहिका था।

सिंहिका राक्षसी बहुत ही चालाक और शक्तिशाली थी। उसके पास एक विशेष शक्ति थी – वह किसी भी व्यक्ति की छाया को पकड़कर उसे अपने वश में कर सकती थी। जो भी समुद्र के ऊपर से उड़ता था, वह उसकी छाया पकड़कर उसे नीचे खींच लेती और फिर उसे खा जाती थी।

जब हनुमान जी तेज़ी से समुद्र के ऊपर उड़ रहे थे, तो अचानक उन्होंने महसूस किया कि कोई उनकी छाया को पकड़ने की कोशिश कर रहा है। वे समझ गए कि यह कोई साधारण बात नहीं है।

“कौन है जो मेरी छाया को पकड़ने का दुस्साहस कर रहा है?” हनुमान जी ने गर्जना की।

तभी समुद्र से एक भयानक आवाज़ आई, “मैं हूँ सिंहिका! जो भी यहाँ से गुज़रता है, वह मेरा भोजन बनता है। तुम भी मेरे पेट में समा जाओगे!”

सिंहिका राक्षसी का विशाल मुँह समुद्र से बाहर निकला। उसके दाँत तलवारों की तरह नुकीले थे और आँखें आग की तरह जल रही थीं। उसने हनुमान जी की छाया को मज़बूती से पकड़ लिया था।

हनुमान जी ने देखा कि वे नीचे की ओर खिंचे जा रहे हैं। लेकिन वे घबराए नहीं। उन्होंने तुरंत एक योजना बनाई।

“हे राक्षसी!” हनुमान जी ने कहा, “यदि तुझमें सच में इतनी शक्ति है, तो मुझे पूरा निगल जा। आधा-अधूरा काम करने से क्या फायदा?”

सिंहिका राक्षसी को लगा कि हनुमान जी डर गए हैं। उसने अपना मुँह और भी बड़ा कर लिया। उसका मुँह इतना बड़ा हो गया कि पूरा आकाश ढक गया।

यही तो हनुमान जी चाहते थे! जैसे ही सिंहिका ने अपना मुँह खोला, हनुमान जी ने अपना रूप छोटा कर लिया और तेज़ी से उसके मुँह में घुस गए।

राक्षसी खुश हो गई कि उसका शिकार अपने आप उसके मुँह में आ गया। लेकिन अगले ही पल, हनुमान जी ने अपना रूप बड़ा कर लिया और अपने तेज़ नाखूनों से सिंहिका राक्षसी के पेट को फाड़ दिया।

“अब तेरा अंत हो गया, दुष्ट राक्षसी!” हनुमान जी ने कहा।

सिंहिका राक्षसी चीखती-चिल्लाती समुद्र में गिर गई। उसकी मृत्यु हो गई और समुद्र का पानी लाल हो गया।

हनुमान जी ने राक्षसी के पेट से बाहर निकलकर फिर से अपनी यात्रा शुरू की। अब वे और भी तेज़ी से लंका की ओर उड़ने लगे।

देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए और हनुमान जी की जय-जयकार की। सिंहिका राक्षसी का वध करके हनुमान जी ने न केवल अपनी रक्षा की, बल्कि भविष्य में आने वाले सभी यात्रियों को भी उस राक्षसी के आतंक से मुक्ति दिलाई।

इस प्रकार, अपनी बुद्धि और वीरता से हनुमान जी ने सिंहिका राक्षसी को हराया और अपने प्रभु श्री राम के कार्य में सफल हुए।

शिक्षा: इस कहानी से हमें सिखने को मिलता है कि बुद्धि और साहस के सामने कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती। हनुमान जी की तरह हमें भी कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखना चाहिए और सोच-समझकर काम करना चाहिए।

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