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पांडु को ऋषि का श्राप – महाभारत की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब हस्तिनापुर में राजा पांडु का शासन था। राजा पांडु एक वीर योद्धा और न्यायप्रिय शासक थे। वे अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे और सभी उनका सम्मान करते थे।

एक दिन राजा पांडु अपनी दोनों रानियों कुंती और माद्री के साथ वन में शिकार खेलने गए। वन में चारों ओर हरियाली थी, पक्षी चहक रहे थे और मधुर हवा बह रही थी। राजा पांडु को शिकार खेलना बहुत पसंद था।

जब वे वन में घूम रहे थे, तो राजा पांडु ने दूर से दो हिरणों को देखा। वे दोनों हिरण बहुत सुंदर थे और आपस में खेल रहे थे। राजा पांडु ने तुरंत अपना धनुष उठाया और तीर चलाने की तैयारी की।

“रुको! रुको!” अचानक एक आवाज आई, लेकिन राजा पांडु ने उस आवाज को नहीं सुना। उन्होंने अपना तीर छोड़ दिया और वह सीधे जाकर नर हिरण के सीने में लगा।

जैसे ही तीर लगा, वह हिरण अचानक एक ऋषि के रूप में बदल गया। वह ऋषि किंदम थे, जो अपनी पत्नी के साथ हिरण का रूप धारण करके वन में विहार कर रहे थे। ऋषि किंदम घायल होकर जमीन पर गिर गए।

राजा पांडु यह देखकर बहुत घबरा गए। वे तुरंत ऋषि के पास दौड़े और उनके चरणों में गिर गए। “हे महर्षि! मुझसे बहुत बड़ा पाप हुआ है। मैंने आपको हिरण समझकर तीर मारा है। कृपया मुझे क्षमा कर दीजिए।”

ऋषि किंदम बहुत दुखी थे। उनकी आंखों में आंसू थे। वे बोले, “राजन! तुमने बिना सोचे-समझे तीर चलाया है। मैं अपनी पत्नी के साथ प्रेम में मग्न था। तुमने मेरे जीवन की सबसे खुशी के पल को छीन लिया है।”

राजा पांडु ने हाथ जोड़कर कहा, “महर्षि, मुझे अपनी गलती का एहसास है। आप जो भी दंड देना चाहें, मैं स्वीकार करूंगा।”

तब ऋषि किंदम ने गुस्से और दुख में कहा, “राजा पांडु! जैसे तुमने मेरे प्रेम के पल को छीना है, वैसे ही तुम्हें भी यह श्राप मिले। जब भी तुम अपनी पत्नी के पास प्रेम से जाओगे, तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।”

पांडु को ऋषि का श्राप सुनकर राजा पांडु का चेहरा पीला पड़ गया। वे समझ गए कि उनकी एक गलती ने उनका पूरा जीवन बदल दिया है। ऋषि किंदम ने अपनी अंतिम सांस ली और स्वर्ग सिधार गए।

राजा पांडु बहुत दुखी होकर अपनी रानियों के पास गए। उन्होंने कुंती और माद्री को सब कुछ बताया। दोनों रानियां यह सुनकर बहुत दुखी हुईं।

राजा पांडु ने कहा, “अब मैं राजपाट छोड़कर वन में तपस्या करूंगा। यही मेरे पाप का प्रायश्चित है।” कुंती और माद्री ने भी अपने पति के साथ वन जाने का निश्चय किया।

वन में रहते हुए राजा पांडु ने कठोर तपस्या की। वे दिन-रात भगवान की आराधना करते रहे। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर देवताओं ने कुंती और माद्री को वरदान दिया कि वे देवताओं के आशीर्वाद से पुत्र प्राप्त कर सकती हैं।

इस प्रकार कुंती के तीन पुत्र हुए – युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन। माद्री के दो पुत्र हुए – नकुल और सहदेव। ये पांचों भाई पांडव कहलाए।

एक दिन वसंत ऋतु में जब चारों ओर फूल खिले हुए थे, राजा पांडु माद्री के साथ वन में घूम रहे थे। प्राकृतिक सुंदरता देखकर वे भूल गए और माद्री के पास गए। ऋषि का श्राप तुरंत फलीभूत हुआ और राजा पांडु की मृत्यु हो गई।

माद्री अपने पति की मृत्यु से इतनी दुखी हुई कि उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए। कुंती अकेली रह गई और उसने पांचों पांडवों का पालन-पोषण किया।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कोई भी काम बिना सोचे-समझे नहीं करना चाहिए। राजा पांडु ने जल्दबाजी में तीर चलाया और इसका परिणाम बहुत भयानक हुआ। हमें हमेशा धैर्य रखना चाहिए और किसी भी काम को करने से पहले अच्छी तरह सोचना चाहिए। गुस्से में लिया गया फैसला हमेशा गलत होता है।

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