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गुरु नानक जी की काबुल में धर्म संवाद की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब गुरु नानक देव जी अपनी धर्म यात्रा पर निकले थे। वे सत्य और प्रेम का संदेश फैलाने के लिए दूर-दूर तक जाते थे। इसी यात्रा के दौरान वे काबुल शहर पहुंचे।

काबुल में उस समय बहुत से विद्वान और धर्मगुरु रहते थे। जब उन्होंने सुना कि एक महान संत आया है, तो वे सभी गुरु नानक जी से मिलने आए। शहर के मुख्य मस्जिद में काबुल में धर्म संवाद का आयोजन किया गया।

पहले दिन, एक बुजुर्ग मौलवी साहब ने गुरु जी से पूछा, “हे संत जी, आप कहते हैं कि सभी धर्म एक हैं। लेकिन हमारे अलग-अलग रीति-रिवाज हैं, अलग-अलग पूजा पद्धतियां हैं। फिर कैसे सब एक हो सकते हैं?”

गुरु नानक जी मुस्कराए और बोले, “मौलवी साहब, देखिए इस बगीचे को। यहां गुलाब, चमेली, मोगरा और कई तरह के फूल हैं। सभी के रंग अलग हैं, खुशबू अलग है, लेकिन सभी फूल हैं। उसी तरह सभी धर्म अलग-अलग रास्ते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है – परमात्मा।”

दूसरे दिन काबुल में धर्म संवाद में एक युवा विद्वान ने प्रश्न किया, “गुरु जी, अगर सभी धर्म सच्चे हैं, तो फिर हम अपने धर्म को श्रेष्ठ क्यों मानते हैं?”

गुरु जी ने उत्तर दिया, “बेटा, जैसे एक मां अपने सभी बच्चों से प्यार करती है, लेकिन हर बच्चा अपनी मां को सबसे अच्छा मानता है। यह गलत नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे बच्चों की मां बुरी है। धर्म भी ऐसा ही है।”

तीसरे दिन के काबुल में धर्म संवाद में एक व्यापारी ने कहा, “गुरु जी, व्यावहारिक जीवन में हम कैसे सभी धर्मों का सम्मान कर सकते हैं?”

गुरु नानक जी ने समझाया, “भाई साहब, जब आप अपनी दुकान में किसी भी धर्म के व्यक्ति के साथ ईमानदारी से व्यापार करते हैं, तो यह धर्म है। जब आप किसी भूखे को खाना देते हैं, चाहे वह किसी भी जाति का हो, तो यह धर्म है। जब आप सच बोलते हैं, तो यह धर्म है।”

चौथे दिन एक बूढ़ी औरत आई और बोली, “गुरु जी, मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं। मैं कैसे परमात्मा को पा सकती हूं?”

गुरु जी ने प्यार से कहा, “माता जी, परमात्मा को पाने के लिए बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं। सच्चे दिल से उसका नाम लेना, दूसरों की सेवा करना और अच्छे काम करना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।”

पांचवें दिन के काबुल में धर्म संवाद में शहर के राजा भी आए। उन्होंने पूछा, “गुरु जी, एक राजा होने के नाते मुझे कभी-कभी कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। क्या यह धर्म के विरुद्ध है?”

गुरु जी ने उत्तर दिया, “महाराज, न्याय करना भी धर्म है। लेकिन न्याय करते समय दया और करुणा को भी साथ रखना चाहिए। कठोरता तभी करें जब वह समाज की भलाई के लिए हो।”

छठे दिन एक युवक ने पूछा, “गुरु जी, आजकल लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं। इसका समाधान क्या है?”

गुरु नानक जी ने गंभीरता से कहा, “बेटा, जो लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं, वे धर्म को नहीं समझते। सच्चा धर्म प्रेम सिखाता है, घृणा नहीं। एकता सिखाता है, बंटवारा नहीं।”

सातवें दिन के अंतिम काबुल में धर्म संवाद में सभी लोग एक साथ आए। गुरु जी ने कहा, “मित्रों, इन सात दिनों में हमने जो बातें की हैं, उसका सार यह है – सभी धर्म अच्छाई सिखाते हैं। हमें अपने धर्म पर गर्व करना चाहिए, लेकिन दूसरे धर्मों का अपमान नहीं करना चाहिए।”

सभी लोग गुरु जी की बातों से बहुत प्रभावित हुए। मौलवी साहब ने कहा, “गुरु जी, आपने हमें सच्चे धर्म का अर्थ समझाया है।”

राजा ने कहा, “आज से मेरे राज्य में सभी धर्मों का सम्मान होगा।”

व्यापारी ने कहा, “मैं सभी के साथ ईमानदारी से व्यापार करूंगा।”

बूढ़ी औरत ने कहा, “मैं सच्चे दिल से परमात्मा का नाम लूंगी।”

इस तरह काबुल में धर्म संवाद समाप्त हुआ। गुरु नानक जी ने सभी को आशीर्वाद दिया और अपनी यात्रा जारी रखी।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सभी धर्म अच्छाई सिखाते हैं। हमें अपने धर्म से प्रेम करना चाहिए, लेकिन दूसरे धर्मों का सम्मान भी करना चाहिए। सच्चा धर्म वह है जो हमें प्रेम, दया, सत्य और सेवा सिखाता है।

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