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वाली-सुग्रीव युद्ध में हनुमान की सहायता

बहुत समय पहले की बात है, जब किष्किंधा नगरी में दो भाई राज करते थे। बड़े भाई का नाम वाली था और छोटे भाई का नाम सुग्रीव था। दोनों भाई वानर थे और बहुत शक्तिशाली थे।

एक दिन एक भयंकर राक्षस ने किष्किंधा पर आक्रमण किया। वाली उस राक्षस से लड़ने गया और एक गुफा में घुस गया। बहुत देर तक वाली वापस नहीं आया। गुफा से खून की धारा बहती देखकर सुग्रीव को लगा कि उसका भाई मर गया है। डर के मारे उसने गुफा का मुंह बंद कर दिया और राजा बन गया।

लेकिन वाली जीवित था! जब वह वापस आया तो देखा कि सुग्रीव राजा बन गया है। “तूने मुझे धोखा दिया है!” वाली ने गुस्से में कहा। उसने सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया और उसकी पत्नी रुमा को भी अपने पास रख लिया।

सुग्रीव बहुत दुखी होकर ऋष्यमूक पर्वत पर चला गया। वहां वह अपने मित्रों के साथ रहने लगा। उसके साथ हनुमान जी भी थे, जो उसके सबसे विश्वसनीय मित्र और सेवक थे।

एक दिन हनुमान जी ने देखा कि दो राजकुमार ऋष्यमूक पर्वत की ओर आ रहे हैं। ये श्री राम और लक्ष्मण थे, जो सीता माता की खोज में भटक रहे थे। हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और उनसे मिले।

“आप कौन हैं और यहां क्यों आए हैं?” हनुमान जी ने पूछा। जब उन्हें पता चला कि ये श्री राम हैं, तो वे बहुत खुश हुए। उन्होंने अपना असली रूप दिखाया और श्री राम को सुग्रीव से मिलवाया।

सुग्रीव ने श्री राम से कहा, “प्रभु, मैं आपकी सीता माता को खोजने में मदद करूंगा, लेकिन पहले आप मुझे वाली से छुटकारा दिलाने में सहायता करें।”

श्री राम ने वादा किया। लेकिन समस्या यह थी कि वाली और सुग्रीव दिखने में बिल्कुल एक जैसे थे। युद्ध के समय श्री राम को पहचानने में कठिनाई हो सकती थी कि कौन वाली है और कौन सुग्रीव।

यहां हनुमान जी की बुद्धिमत्ता काम आई। उन्होंने एक उपाय सुझाया। “प्रभु, सुग्रीव के गले में यह फूलों की माला पहना देते हैं। इससे आप आसानी से पहचान सकेंगे।”

हनुमान जी ने सुग्रीव के गले में सुंदर फूलों की माला पहनाई। अब वाली-सुग्रीव युद्ध की तैयारी शुरू हुई।

हनुमान जी ने सुग्रीव को समझाया, “मित्र, तुम वाली को युद्ध के लिए ललकारो। श्री राम छुपकर तुम्हारी सहायता करेंगे। लेकिन डरना मत, मैं भी तुम्हारे साथ हूं।”

सुग्रीव ने किष्किंधा जाकर वाली को युद्ध के लिए ललकारा। “वाली! बाहर आ और मुझसे युद्ध कर!” सुग्रीव ने जोर से आवाज लगाई।

वाली गुस्से में बाहर आया। “तू फिर आ गया? अब तुझे सबक सिखाता हूं!” कहकर वह सुग्रीव पर टूट पड़ा।

दोनों भाइयों में भयंकर युद्ध शुरू हुआ। वे आकाश में उड़ते, पेड़ों पर कूदते, और एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे। हनुमान जी दूर से देख रहे थे और सुग्रीव का हौसला बढ़ा रहे थे।

श्री राम ने देखा कि फूलों की माला वाले सुग्रीव हैं। उन्होंने अपना तीर चलाया और वाली को मार गिराया। वाली समझ गया कि यह कोई साधारण युद्ध नहीं था।

मरते समय वाली ने श्री राम से कहा, “प्रभु, मैंने गलती की थी। कृपया मेरे पुत्र अंगद का ख्याल रखना।” श्री राम ने वादा किया।

इस प्रकार वाली-सुग्रीव युद्ध में हनुमान जी की सहायता से सुग्रीव को न्याय मिला। सुग्रीव फिर से किष्किंधा का राजा बना और उसकी पत्नी रुमा उसे वापस मिल गई।

हनुमान जी ने सुग्रीव से कहा, “मित्र, अब हमारा कर्तव्य है कि हम श्री राम की सीता माता को खोजने में पूरी सहायता करें।”

सुग्रीव ने अपनी सेना के साथ सीता माता की खोज शुरू की। हनुमान जी ने इस खोज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में लंका जाकर सीता माता को खोज निकाला।

सीख: इस कहानी से हमें सिखाया जाता है कि सच्चे मित्र हमेशा मुश्किल समय में साथ देते हैं। हनुमान जी की तरह हमें भी अपने मित्रों की सहायता करनी चाहिए और न्याय के लिए खड़े होना चाहिए। बुद्धिमत्ता और वफादारी से हर समस्या का समाधान हो सकता है।

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