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सात रंगों का मछली और राज्य का भेद

बहुत समय पहले की बात है, जब दुनिया में अजीबोगरीब तिलस्म और जादू का राज था। उस समय एक सुंदर राज्य था जिसका नाम था ‘इंद्रधनुष नगर’। इस राज्य के राजा महाराज विक्रमादित्य बहुत ही न्यायप्रिय और दयालु थे।

एक दिन राजा के दरबार में एक अजीब घटना हुई। राज्य के सबसे बड़े तालाब से एक जादुई मछली निकली जिसके शरीर पर सात अलग-अलग रंग चमक रहे थे। यह सात रंगों का मछली इतनी सुंदर थी कि देखने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था।

मछली ने मानवीय आवाज में कहा, ‘हे राजन! मैं इस राज्य की रक्षक हूं। मेरे पास एक महत्वपूर्ण संदेश है।’ राजा और सभी दरबारी आश्चर्य में पड़ गए।

सात रंगों का मछली ने आगे कहा, ‘आपके राज्य में एक गुप्त खजाना छुपा है जो केवल सच्चे दिल वाले व्यक्ति को ही मिल सकता है। लेकिन इसके साथ एक राज्य का भेद भी जुड़ा है।’

राजा ने विनम्रता से पूछा, ‘हे दिव्य मछली, कृपया हमें बताएं कि यह भेद क्या है?’

जादुई मछली ने कहा, ‘महाराज, आपके राज्य की सीमा पर एक गरीब मछुआरा रहता है। उसका नाम रामदास है। वह रोज मेहनत करता है लेकिन फिर भी गरीब है। असल में, वह आपके राज्य का असली वारिस है।’

यह सुनकर सभी दरबारी हैरान रह गए। राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को भेजकर रामदास को दरबार में बुलवाया।

जब रामदास आया तो सात रंगों का मछली ने कहा, ‘रामदास, तुम्हारे दादाजी इस राज्य के पूर्व राजा थे। एक तिलस्म के कारण तुम्हारा परिवार गरीब हो गया था।’

मछली ने आगे बताया, ‘इस तिलस्म को तोड़ने के लिए तुम्हें तीन काम करने होंगे। पहला – एक भूखे को खाना खिलाना, दूसरा – एक प्यासे को पानी देना, और तीसरा – किसी जरूरतमंद की सच्चे दिल से मदद करना।’

रामदास ने कहा, ‘लेकिन मैं तो खुद ही गरीब हूं। मेरे पास क्या है जो मैं दूसरों को दे सकूं?’

जादुई मछली मुस्कराई और बोली, ‘बेटा, सच्चा दान वही है जो कम होने पर भी दिया जाए।’

रामदास ने हिम्मत जुटाई। उसने अपनी आधी रोटी एक भूखे बच्चे को दी, अपने घड़े का आधा पानी एक प्यासे बूढ़े को दिया, और अपनी एकमात्र चादर एक ठंड से कांपते व्यक्ति को दे दी।

जैसे ही रामदास ने यह तीनों काम पूरे किए, सात रंगों का मछली के शरीर से तेज रोशनी निकली। अचानक जमीन से एक सुंदर महल निकला और रामदास के फटे कपड़े राजसी वस्त्रों में बदल गए।

मछली ने कहा, ‘रामदास, तुमने सच्चे दिल से दान किया है। अब राज्य का भेद खुल गया है। तुम इस राज्य के सच्चे वारिस हो।’

राजा विक्रमादित्य ने खुशी से रामदास को गले लगाया और कहा, ‘मित्र, तुम्हारा दिल सोने से भी कीमती है। आओ, हम मिलकर इस राज्य को और भी खुशहाल बनाएं।’

उस दिन के बाद दोनों राजा मिलकर राज्य चलाने लगे। सात रंगों का मछली ने अपना काम पूरा करके स्वर्ग की यात्रा की।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा धन वह नहीं जो हमारे पास है, बल्कि वह है जो हम दूसरों के साथ बांटते हैं। दयालुता और परोपकार ही सबसे बड़ा खजाना है।

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