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विक्रम तथा बेताल की अंतिम कहानी – पच्चीसवीं कहानी
प्राचीन काल में उज्जैन के महान राजा विक्रमादित्य अपनी न्यायप्रियता और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। यह विक्रम बेताल कहानी भाग – 25 की अंतिम गाथा है, जो बेताल पच्चीसी – पच्चीसवीं कहानी के रूप में जानी जाती है।
चौबीस कहानियों के बाद, बेताल ने राजा विक्रम से कहा, “हे राजन्! आज मैं आपको अंतिम कहानी सुनाता हूँ। इसके बाद मेरा आपसे वास्ता समाप्त हो जाएगा।”
बेताल ने कहानी शुरू की – “एक समय की बात है, कल्याणपुर नामक नगर में राजा कल्याण सिंह राज्य करते थे। उनकी एक अत्यंत सुंदर और गुणवती पुत्री थी, जिसका नाम सुनंदा था। राजकुमारी सुनंदा की सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी।”
बेताल आगे बोला, “एक दिन तीन राजकुमार एक साथ राजा कल्याण सिंह के दरबार में पहुंचे। पहला राजकुमार अमित था, जो अपनी विद्या और बुद्धि के लिए प्रसिद्ध था। दूसरा राजकुमार सुमित था, जो अपनी वीरता और युद्ध कौशल के लिए जाना जाता था। तीसरा राजकुमार विमल था, जो अपनी दानवीरता और उदारता के लिए प्रसिद्ध था।”
तीनों राजकुमारों ने राजा से राजकुमारी सुनंदा से विवाह की अनुमति मांगी। राजा कल्याण सिंह बड़ी दुविधा में पड़ गए। तीनों राजकुमार अपने-अपने गुणों में श्रेष्ठ थे।
राजा ने कहा, “मैं एक परीक्षा लूंगा। जो इसमें सफल होगा, उसी से मेरी पुत्री का विवाह होगा।” राजा ने बताया कि नगर के बाहर एक भयानक राक्षस रहता है, जो प्रजा को परेशान करता है। जो उसे मारकर प्रजा की रक्षा करेगा, वही राजकुमारी से विवाह का अधिकारी होगा।
तीनों राजकुमार राक्षस से युद्ध करने निकले। राजकुमार अमित ने अपनी बुद्धि से राक्षस की कमजोरी जानी। राजकुमार सुमित ने अपनी तलवार से राक्षस पर आक्रमण किया। राजकुमार विमल ने अपने धन से गरीब लोगों की सहायता करके उनका आशीर्वाद लिया।
युद्ध के दौरान राक्षस ने राजकुमार सुमित को बुरी तरह घायल कर दिया। राजकुमार अमित की बुद्धि से राक्षस कमजोर हो गया, लेकिन मरा नहीं। तब राजकुमार विमल के पुण्य कर्मों और प्रजा के आशीर्वाद से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसने राक्षस का वध कर दिया।
राक्षस के मरने के बाद तीनों राजकुमार वापस राजा के पास पहुंचे। अब राजा फिर से दुविधा में पड़ गए कि किसे राजकुमारी से विवाह का अधिकार दें।
बेताल ने राजा विक्रम से प्रश्न किया, “हे राजन्! बताइए कि राजकुमारी सुनंदा से विवाह का सबसे अधिक हकदार कौन है? यदि आप जानते हुए भी चुप रहे तो आपका सिर फट जाएगा।”
राजा विक्रम ने सोचकर उत्तर दिया, “हे बेताल! राजकुमार विमल को राजकुमारी से विवाह का अधिकार है। क्योंकि राजकुमार अमित की बुद्धि और राजकुमार सुमित की वीरता तो केवल राक्षस को कमजोर कर सकी, लेकिन राजकुमार विमल के पुण्य कर्मों और दानवीरता से ही राक्षस का वध हुआ। सच्चा योद्धा वही है जो अपने अच्छे कर्मों से दुष्टों का नाश करे।”
राजा विक्रम का उत्तर सुनकर बेताल प्रसन्न हुआ और बोला, “राजन्! आपने सही उत्तर दिया है। यह विक्रम तथा बेताल की अंतिम कहानी थी। अब मैं आपको सच्चाई बताता हूँ।”
बेताल ने राजा विक्रम को बताया कि वह तांत्रिक के जाल में फंसा हुआ था। तांत्रिक चाहता था कि राजा विक्रम उसे बेताल लेकर आएं ताकि वह राजा की बलि देकर महान शक्तियां प्राप्त कर सके।
बेताल ने चेतावनी दी, “राजन्! जब आप तांत्रिक के पास पहुंचेंगे तो वह आपसे कहेगा कि मुझे जमीन पर रखकर प्रणाम करें। लेकिन जैसे ही आप झुकेंगे, वह आपका सिर काटकर मुझसे महान शक्तियां मांगेगा। इसलिए आप पहले उससे कहना कि प्रणाम करने का सही तरीका दिखाएं।”
राजा विक्रम ने बेताल की बात मानी। जब वे तांत्रिक के पास पहुंचे तो वैसा ही हुआ जैसा बेताल ने कहा था। तांत्रिक जैसे ही प्रणाम करने के लिए झुका, राजा विक्रम ने तुरंत अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया।
बेताल ने राजा विक्रम से कहा, “हे न्यायप्रिय राजन्! आपकी बुद्धि, धैर्य और न्यायप्रियता से मैं बहुत प्रभावित हूँ। आज से आप जब भी संकट में होंगे, मैं आपकी सहायता करूंगा।”
इस प्रकार समाप्त हुई बेताल पच्चीसी – पच्चीसवीं कहानी। राजा विक्रम अपने राज्य वापस लौट गए और न्याय के साथ राज्य करते रहे।
शिक्षा: इस कहानी से हमें सिखाया जाता है कि सच्चा बल केवल शारीरिक शक्ति या बुद्धि में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों और पुण्य में होता है। धैर्य, न्याय और सत्य का साथ देने वाले व्यक्ति को हमेशा सफलता मिलती है।











