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नारद अवतार की कथा – देवर्षि का जन्म और भक्ति प्रचार
बहुत समय पहले की बात है, जब संसार में धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष चल रहा था। उस समय भगवान विष्णु ने देखा कि पृथ्वी पर भक्ति और ज्ञान का प्रसार करने के लिए एक विशेष अवतार की आवश्यकता है। इसी आवश्यता को पूरा करने के लिए नारद अवतार की कथा का आरंभ हुआ।
ब्रह्मा जी के मानसपुत्र के रूप में नारद मुनि का जन्म हुआ। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और हमेशा “नारायण नारायण” का जाप करते रहते थे। उनके हाथ में वीणा थी जिसका नाम महती था, और जब भी वे इसे बजाते, तो पूरा ब्रह्मांड भक्ति रस में डूब जाता था।
देवर्षि के रूप में नारद जी का स्थान सभी लोकों में सम्मानित था। वे देवताओं के गुरु थे और ऋषियों में श्रेष्ठ माने जाते थे। उनका मुख्य कार्य था तीनों लोकों में घूम-घूमकर भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करना।
एक दिन नारद जी ब्रह्मलोक में अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गए। उन्होंने पूछा, “पिताजी, मैं कैसे जान सकूं कि मेरी भक्ति सच्ची है?”
ब्रह्मा जी मुस्कराए और बोले, “पुत्र नारद, सच्ची भक्ति वही है जो निस्वार्थ हो। तुम्हारा कार्य है संसार में भक्ति का प्रसार करना।”
भक्ति का प्रचार करने के लिए नारद जी ने अपनी यात्रा शुरू की। वे पहले स्वर्गलोक गए जहाँ इंद्र और अन्य देवता रहते थे। वहाँ उन्होंने देखा कि देवता अपनी शक्ति और ऐश्वर्य में मगन हैं, लेकिन भक्ति भाव कम है।
नारद जी ने अपनी मधुर वीणा बजाई और गाया:
“हरि अनंत हरि कथा अनंता,
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता।
नारायण गुण गावत नारद,
भक्ति भाव से मन में हर्षित।”
इंद्र और अन्य देवताओं के हृदय में भक्ति का भाव जाग उठा। वे समझ गए कि सच्चा सुख भगवान की भक्ति में ही है।
फिर नारद जी पृथ्वीलोक आए। यहाँ उन्होंने देखा कि राजा-महाराजा अपने राज्य के विस्तार में व्यस्त हैं। उन्होंने राजा अंबरीष के पास जाकर कहा, “राजन्, राज्य तो नश्वर है, लेकिन भगवान की भक्ति अमर है।”
राजा अंबरीष ने पूछा, “देवर्षि, मैं राजा हूँ। मेरे पास प्रजा की जिम्मेदारी है। क्या मैं भक्ति कर सकता हूँ?”
नारद जी ने समझाया, “राजन्, कर्म करते हुए भी भक्ति की जा सकती है। अपने कर्तव्य का पालन करो, लेकिन मन में हमेशा भगवान को रखो।”
इस प्रकार नारद अवतार की कथा में दिखाया गया है कि कैसे वे हर वर्ग के लोगों को भक्ति का मार्ग दिखाते थे।
एक बार की बात है, नारद जी को अहंकार हो गया कि वे सबसे बड़े भक्त हैं। भगवान विष्णु ने उनके इस अहंकार को दूर करने के लिए एक लीला रची।
विष्णु भगवान ने माया से एक सुंदर नगर बनाया और वहाँ एक राजकुमारी का स्वयंवर रखा। नारद जी जब वहाँ पहुंचे तो राजकुमारी की सुंदरता देखकर मोहित हो गए।
वे भगवान विष्णु के पास गए और बोले, “प्रभु, मैं उस राजकुमारी से विवाह करना चाहता हूँ। कृपया मुझे आपके समान सुंदर रूप दे दीजिए।”
भगवान विष्णु ने कहा, “तथास्तु, तुम्हें मेरा रूप मिले।” लेकिन उन्होंने नारद जी को वानर का मुख दे दिया।
स्वयंवर में जब राजकुमारी नारद जी के पास आई तो वानर मुख देखकर हंसने लगी और आगे बढ़ गई। वह जाकर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी।
नारद जी को बहुत क्रोध आया। उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया, “आपने मेरे साथ छल किया है। आप भी वानरों की सहायता के बिना अपना कार्य पूरा नहीं कर सकेंगे।”
भगवान विष्णु मुस्कराए और बोले, “नारद, तुम्हारा श्राप मुझे स्वीकार है। लेकिन समझो कि भक्ति में अहंकार नहीं होना चाहिए।”
नारद जी को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे भगवान के चरणों में गिर पड़े और क्षमा मांगी। इस घटना के बाद वे और भी विनम्र हो गए।
बाद में जब भगवान विष्णु ने राम अवतार लिया, तो नारद जी का श्राप फलीभूत हुआ और हनुमान जी तथा वानर सेना की सहायता से रावण का वध हुआ।
नारद जी की एक और महत्वपूर्ण कथा है जब वे ध्रुव के पास गए। छोटे ध्रुव को सौतेली माँ ने अपमानित किया था। नारद जी ने उसे भगवान विष्णु की भक्ति का मार्ग दिखाया।
उन्होंने ध्रुव से कहा, “बेटा, तुम वन में जाकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करो। भगवान अवश्य तुम्हारी सुनेंगे।”
ध्रुव ने नारद जी की बात मानी और कठोर तपस्या की। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और ध्रुव को ध्रुव तारा बना दिया।
इसी प्रकार नारद जी ने प्रह्लाद को भी भक्ति का मार्ग दिखाया। जब हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से रोकने की कोशिश कर रहा था, तब नारद जी ने गुप्त रूप से प्रह्लाद की माता को भक्ति की शिक्षा दी थी।
नारद जी हमेशा कहते थे, “भक्ति में जाति, धर्म, अमीर-गरीब का भेद नहीं होता। जो भी सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, वे उसकी सुनते हैं।”
एक दिन नारद जी ने देखा कि एक गरीब ब्राह्मण परिवार भूख से परेशान है। उन्होंने उस ब्राह्मण से कहा, “तुम रोज सुबह उठकर भगवान विष्णु का नाम लो और फिर अपना काम करो। देखना, सब कुछ ठीक हो जाएगा।”
ब्राह्मण ने वैसा ही किया। कुछ दिनों बाद राजा को एक योग्य पुरोहित की जरूरत पड़ी और वह ब्राह्मण राजपुरोहित बन गया।
नारद जी की शिक्षा थी कि भक्ति करने से मनुष्य के सभी दुख दूर हो जाते हैं। वे कहते थे, “जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान का नाम लेता है, उसके जीवन में शांति और खुशी आती है।”
तीनों लोकों में घूमते हुए नारद जी ने अनगिनत लोगों को भक्ति का मार्ग दिखाया। वे राक्षसों को भी समझाते थे कि बुराई छोड़कर भगवान की शरण में आ जाएं।
एक बार रावण के भाई विभीषण के पास जाकर उन्होंने कहा, “विभीषण, तुम्हारे भाई रावण गलत रास्ते पर हैं। तुम धर्म का साथ दो।”
विभीषण ने नारद जी की बात मानी और बाद में भगवान राम की शरण में चला गया।
नारद अवतार की कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भक्ति सबसे बड़ा धन है। नारद जी आज भी तीनों लोकों में घूमकर भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करते रहते हैं।
जब भी कोई व्यक्ति सच्चे मन से “नारायण नारायण” कहता है, तो नारद जी की कृपा उस पर होती है। वे उस व्यक्ति को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता करते हैं।
इस प्रकार देवर्षि नारद का अवतार भगवान विष्णु की एक अनुपम लीला है, जो हमें सिखाती है कि जीवन में भक्ति और विनम्रता सबसे महत्वपूर्ण हैं। नारद जी की कथाएं आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।













