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हयग्रीव अवतार की कथा – वेदों के रक्षक की गाथा

बहुत समय पहले की बात है, जब संसार में अधर्म का अंधकार छाया हुआ था। उस समय हयग्रीव अवतार की कथा का आरंभ होता है, जो भगवान विष्णु के सबसे महत्वपूर्ण अवतारों में से एक है।

सृष्टि के आरंभ में, जब ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे, तो उन्होंने चार पवित्र वेदों की रचना की – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये वेद संसार के सभी ज्ञान का भंडार थे। इनमें धर्म, न्याय, और जीवन जीने की सही राह का ज्ञान था।

एक दिन ब्रह्मा जी गहरी निद्रा में चले गए। उसी समय दो शक्तिशाली असुर मधु और कैटभ वहाँ पहुँचे। ये दोनों असुर बहुत चालाक और दुष्ट थे। उन्होंने देखा कि ब्रह्मा जी सो रहे हैं और उनके पास चारों वेद रखे हुए हैं।

“देखो कैटभ!” मधु ने कहा, “ये वेद तो अमूल्य खजाना हैं। अगर हम इन्हें चुरा लें, तो संसार में अज्ञानता फैल जाएगी और हम आसानी से राज कर सकेंगे।”

“बिल्कुल सही कहा मधु!” कैटभ ने उत्तर दिया। “जब लोगों के पास ज्ञान नहीं होगा, तो वे धर्म का पालन नहीं कर पाएंगे।”

दोनों असुरों ने चुपके से चारों वेदों को चुरा लिया और समुद्र की गहराई में जाकर छुप गए। जब ब्रह्मा जी की नींद खुली, तो वे बहुत परेशान हो गए। वेदों के बिना सृष्टि अधूरी थी।

ब्रह्मा जी तुरंत भगवान विष्णु के पास गए। “हे प्रभु!” उन्होंने कहा, “मधु और कैटभ नामक असुरों ने वेदों को चुरा लिया है। आपकी सहायता के बिना मैं इन्हें वापस नहीं ला सकता।”

भगवान विष्णु ने कहा, “चिंता न करें ब्रह्मा जी। मैं हयग्रीव अवतार लूंगा और वेदों की रक्षा करूंगा।”

भगवान विष्णु ने एक अद्भुत रूप धारण किया। उनका शरीर मनुष्य का था, लेकिन सिर घोड़े का था। यह रूप अत्यंत तेजस्वी और ज्ञान से भरपूर था। घोड़े का सिर ज्ञान और गति का प्रतीक था।

हयग्रीव अवतार की कथा में यह बताया गया है कि भगवान हयग्रीव का रूप देखकर सभी देवता प्रसन्न हो गए। उनके मुख से निकलने वाली आवाज़ में वेदों के मंत्रों की शक्ति थी।

हयग्रीव भगवान समुद्र की गहराई में गए, जहाँ मधु और कैटभ छुपे हुए थे। दोनों असुर वेदों को अपने पास रखकर बहुत खुश थे।

“कौन है वहाँ?” मधु ने चिल्लाकर पूछा जब उसने हयग्रीव भगवान को देखा।

“मैं हयग्रीव हूँ,” भगवान ने गर्जना की। “तुमने जो वेद चुराए हैं, उन्हें तुरंत वापस कर दो।”

“हा हा हा!” कैटभ हँसा। “तुम अकेले हमारा क्या बिगाड़ सकते हो? हम दो शक्तिशाली असुर हैं।”

इसके बाद भयंकर युद्ध शुरू हुआ। मधु-कैटभ से युद्ध में हयग्रीव भगवान ने अपनी अद्भुत शक्तियों का प्रदर्शन किया। उनके मुख से वेदों के पवित्र मंत्र निकल रहे थे, जिससे असुरों की शक्ति कम होती जा रही थी।

मधु ने अपनी माया का प्रयोग करके हज़ारों रूप बना लिए, लेकिन हयग्रीव भगवान की ज्ञान की शक्ति के सामने सभी माया व्यर्थ थी। कैटभ ने समुद्र को उबालने की कोशिश की, लेकिन भगवान के तेज के सामने वह भी असफल रहा।

युद्ध कई दिनों तक चला। अंत में हयग्रीव भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से दोनों असुरों का वध कर दिया। वेदों की पुनर्प्राप्ति हो गई और ज्ञान का प्रकाश फिर से संसार में फैल गया।

भगवान हयग्रीव ने वेदों को सुरक्षित ब्रह्मा जी को सौंप दिया। ब्रह्मा जी बहुत प्रसन्न हुए और बोले, “हे प्रभु! आपने न केवल वेदों की रक्षा की है, बल्कि संसार में ज्ञान और धर्म की स्थापना भी की है।”

हयग्रीव भगवान ने कहा, “जब भी संसार में अज्ञानता का अंधकार छाएगा, मैं हयग्रीव अवतार लेकर ज्ञान की रक्षा करूंगा। विद्यार्थी और ज्ञान के खोजी मेरी पूजा करें, तो उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त होगा।”

इस प्रकार हयग्रीव अवतार की कथा समाप्त होती है। आज भी विद्यार्थी और शिक्षक हयग्रीव भगवान की पूजा करते हैं। वे ज्ञान के देवता माने जाते हैं और उनकी कृपा से बुद्धि तेज़ होती है।

इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान सबसे बड़ा धन है। जो लोग ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं या उसे नष्ट करने की कोशिश करते हैं, उनका अंत निश्चित है। भगवान हमेशा धर्म और ज्ञान की रक्षा करते हैं।

हयग्रीव भगवान की जय! वेदों की जय! ज्ञान की जय!

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