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माँ काली का प्रकट्य – असुरों का संहार

बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर अधर्म का राज था। रक्तबीज नामक एक महाशक्तिशाली असुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उसे ब्रह्मा जी से एक अनोखा वरदान मिला था – जब भी उसके शरीर से खून की एक बूंद धरती पर गिरती, वहाँ एक नया रक्तबीज पैदा हो जाता।

देवताओं ने अनेक बार रक्तबीज से युद्ध किया, परंतु हर बार वह और भी शक्तिशाली होकर लौटता। जब भी कोई देवता उसे घायल करता, उसके खून से हजारों रक्तबीज बन जाते। स्वर्गलोक में त्राहि-त्राहि मच गई।

अंत में सभी देवता माँ दुर्गा के पास पहुँचे। उन्होंने कहा, “हे जगत्जननी! केवल आप ही इस संकट से हमारी रक्षा कर सकती हैं। रक्तबीज का वध करना असंभव लग रहा है।”

माँ दुर्गा ने देवताओं की पुकार सुनी। वे समझ गईं कि इस समस्या का समाधान केवल काली का प्रकट्य ही हो सकता है। उन्होंने अपने तेज से एक नई शक्ति का जन्म दिया।

अचानक युद्धभूमि में एक भयंकर गर्जना गूंजी। आकाश में काले बादल छा गए। बिजली चमकने लगी। और तभी माँ दुर्गा के मस्तक से एक अद्भुत ज्योति निकली। यह ज्योति धीरे-धीरे एक भयानक रूप में बदलने लगी।

काली का प्रकट्य हुआ! उनका रूप देखकर सभी दैत्य काँप उठे। माँ काली का रंग काला था, बाल बिखरे हुए थे, आँखें लाल थीं। उनके गले में कटे हुए सिरों की माला थी। हाथों में खड्ग और कटा हुआ सिर था। वे नंगे पैर थीं और उनकी जीभ बाहर निकली हुई थी।

रक्तबीज ने जब माँ काली को देखा तो वह हँसा, “एक और देवी आई है मुझसे लड़ने! देखता हूँ कि तुम्हारा क्या हाल करता हूँ।”

माँ काली ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे तुरंत रक्तबीज पर टूट पड़ीं। उनकी तलवार की चमक से पूरा आकाश जगमगा उठा। रक्तबीज भी अपनी पूरी शक्ति से लड़ने लगा।

युद्ध के दौरान जब भी रक्तबीज घायल होता, माँ काली तुरंत उसके खून की बूंदों को अपनी जीभ से चाट लेतीं। इस प्रकार एक भी बूंद धरती पर नहीं गिरने दी। रक्तबीज समझ गया कि यह कोई साधारण शक्ति नहीं है।

“यह कैसे हो सकता है?” रक्तबीज चिल्लाया। “मेरे खून से नए रक्तबीज क्यों नहीं बन रहे?”

माँ काली ने गर्जना की, “दुष्ट! अब तेरा अंत निश्चित है। धर्म की रक्षा के लिए काली का प्रकट्य हुआ है।”

अंततः माँ काली ने अपनी तलवार से रक्तबीज का सिर काट दिया। उसके शरीर से निकलने वाला सारा खून माँ काली ने पी लिया। इस प्रकार रक्तबीज का पूर्ण विनाश हो गया।

युद्ध समाप्त होने के बाद माँ काली का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे तांडव करने लगीं। उनके पैरों की आवाज से पूरी धरती हिलने लगी। सभी देवता घबरा गए।

तब भगवान शिव स्वयं आए। उन्होंने माँ काली के पैरों के नीचे लेट गए। जब माँ काली का पैर शिव जी के सीने पर पड़ा, तो उन्हें एहसास हुआ कि वे अपने पति पर पैर रख रही हैं।

माँ काली का क्रोध तुरंत शांत हो गया। उन्होंने अपनी जीभ बाहर निकाली – यह लज्जा का प्रतीक था। वे समझ गईं कि अब उनका कार्य पूरा हो गया है।

सभी देवताओं ने माँ काली की स्तुति की। इंद्र ने कहा, “हे माँ! आपके काली का प्रकट्य से ही हमारी रक्षा हुई है। आप सदा हमारी रक्षा करती रहें।”

माँ काली ने आशीर्वाद दिया, “जो भी भक्त सच्चे मन से मेरी पूजा करेगा, मैं उसकी सभी बाधाओं का नाश करूंगी। बुराई पर अच्छाई की जीत हमेशा होगी।”

इस प्रकार काली का प्रकट्य धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए हुआ। माँ काली का यह रूप भले ही भयानक लगे, परंतु वे अपने भक्तों के लिए सबसे दयालु माता हैं। वे बुराई का नाश करके धर्म की स्थापना करती हैं।

आज भी जब कोई भक्त संकट में होता है और सच्चे मन से माँ काली को पुकारता है, तो वे तुरंत प्रकट होकर उसकी रक्षा करती हैं। माँ काली का प्रकट्य हमें सिखाता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली हो, अच्छाई की जीत निश्चित है।

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