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नेकी कर दरिया में डाल – बीरबल की सीख

मुगल सम्राट अकबर के दरबार में एक दिन एक अजीब घटना घटी। दरबार में एक धनी सेठ आया था जो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। सेठ जी ने बादशाह अकबर से कहा, “हुजूर, मैं हमेशा से यह मानता आया हूं कि नेकी कर दरिया में डाल। लेकिन आजकल लोग मेरी नेकी को भूल जाते हैं और कृतघ्न निकलते हैं।”

अकबर ने सेठ की बात सुनी और कहा, “सेठ जी, आपकी बात सही है। लेकिन क्या आप वाकई नेकी कर दरिया में डाल के सिद्धांत को समझते हैं?”

सेठ ने गर्व से कहा, “बिल्कुल हुजूर! मैं बिना किसी अपेक्षा के दान करता हूं।”

तभी बीरबल ने आगे बढ़कर कहा, “महाराज, क्या मैं सेठ जी से एक प्रश्न पूछ सकता हूं?”

अकबर ने अनुमति दी। बीरबल ने सेठ से पूछा, “सेठ जी, यदि आप वाकई नेकी कर दरिया में डाल के सिद्धांत को मानते हैं, तो फिर आप यहां क्यों आए हैं? आप तो कह रहे हैं कि लोग आपकी नेकी भूल जाते हैं।”

सेठ थोड़ा परेशान हुआ और बोला, “मैं तो केवल अपनी समस्या बता रहा था।”

बीरबल मुस्कराए और कहा, “सेठ जी, नेकी कर दरिया में डाल का मतलब यह है कि जब आप कोई अच्छा काम करें तो उसे भूल जाएं, जैसे दरिया में कुछ फेंकने पर वह गायब हो जाता है। लेकिन आप तो अपनी हर नेकी को याद रखते हैं और चाहते हैं कि दूसरे भी याद रखें।”

अकबर ने बीरबल की बात सुनकर कहा, “बीरबल, तुम सही कह रहे हो। लेकिन क्या तुम इसे और भी स्पष्ट कर सकते हो?”

बीरबल ने कहा, “जी हां महाराज। मैं एक कहानी सुनाता हूं।”

“एक बार एक गांव में दो व्यापारी रहते थे। पहला व्यापारी जब भी किसी की मदद करता था तो सबको बताता था। वह कहता था कि मैं नेकी कर दरिया में डाल में विश्वास रखता हूं, लेकिन फिर भी वह अपनी हर नेकी का हिसाब रखता था।”

“दूसरा व्यापारी चुपचाप लोगों की मदद करता था और कभी किसी को बताता नहीं था। एक दिन गांव में बाढ़ आई। पहले व्यापारी ने सबसे कहा कि मैंने तुम्हारी इतनी मदद की है, अब तुम मेरी मदद करो। लेकिन दूसरे व्यापारी ने कुछ नहीं कहा।”

“आश्चर्य की बात यह थी कि गांव के लोग अपने आप दूसरे व्यापारी की मदद के लिए दौड़े आए। क्योंकि उन्होंने उसकी नेकी को दिल से महसूस किया था, जबकि पहले व्यापारी की नेकी केवल दिखावा लगती थी।”

सेठ ने बीरबल की कहानी सुनकर कहा, “लेकिन बीरबल साहब, अगर हम अपनी नेकी को बिल्कुल भूल जाएं तो फिर हमें कैसे पता चलेगा कि हमने कितना अच्छा काम किया है?”

बीरबल ने हंसते हुए जवाब दिया, “सेठ जी, यही तो नेकी कर दरिया में डाल का असली मतलब है। जब आप सच्चे दिल से कोई अच्छा काम करते हैं तो आपको गिनती करने की जरूरत नहीं होती। आपका मन खुद ही संतुष्ट हो जाता है।”

“जब आप नेकी करके उसे भूल जाते हैं, तो वह नेकी आपके चरित्र का हिस्सा बन जाती है। और जब नेकी आपके स्वभाव में शामिल हो जाती है, तो लोग अपने आप आपका सम्मान करने लगते हैं।”

अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “वाह बीरबल! तुमने बहुत सुंदर तरीके से समझाया है। सेठ जी, अब आप समझ गए होंगे कि नेकी कर दरिया में डाल का वास्तविक अर्थ क्या है।”

सेठ ने शर्मिंदगी से सिर झुकाया और कहा, “जी हां महाराज, अब मैं समझ गया हूं। मैं अपनी नेकी का हिसाब रखकर उसे व्यापार बना रहा था। आज से मैं सच्चे दिल से नेकी करूंगा और उसे भूल जाऊंगा।”

बीरबल ने अंत में कहा, “सेठ जी, याद रखिए कि नेकी कर दरिया में डाल का मतलब यह नहीं है कि आप नेकी करना बंद कर दें। इसका मतलब है कि आप नेकी को अपना स्वभाव बना लें, न कि दिखावे का साधन।”

“जब आप बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी को बताए, सच्चे दिल से अच्छे काम करते हैं, तो वही सच्ची नेकी है। और ऐसी नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती।”

दरबार में सभी लोगों ने बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा की। सेठ जी ने बीरबल को धन्यवाद दिया और वादा किया कि वे आगे से सच्चे दिल से नेकी करेंगे।

सीख: नेकी कर दरिया में डाल का अर्थ है कि हमें अच्छे काम बिना किसी अपेक्षा के करने चाहिए और उन्हें भूल जाना चाहिए। सच्ची नेकी वह है जो दिल से की जाए, दिखावे के लिए नहीं। जब हम अपनी नेकी को भूल जाते हैं, तो वह हमारे चरित्र का हिस्सा बन जाती है और हमें सच्ची खुशी मिलती है।

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