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ब्राह्मण और सांप की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गांव में पंडित विष्णुदास नाम का एक दयालु ब्राह्मण रहता था। वह बहुत ही सरल स्वभाव का था और सभी जीवों पर दया करता था। उसका एक छोटा सा घर था जिसके पीछे एक पुराना बरगद का पेड़ था।
एक दिन की बात है, जब पंडित जी अपने घर के पीछे बैठकर पूजा कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे एक काला सांप पड़ा हुआ है। सांप बहुत कमजोर लग रहा था और उसकी सांस तेज़ चल रही थी।
“अरे! यह बेचारा सांप तो बहुत बीमार लगता है,” पंडित जी ने मन में सोचा। उनका दयालु हृदय सांप को देखकर पिघल गया।
पंडित जी ने सोचा कि यह सांप भूख और प्यास से मर रहा है। उन्होंने तुरंत अपने घर से दूध का एक कटोरा लाया और सांप के पास रख दिया। सांप ने प्यास से दूध पिया और थोड़ा बेहतर महसूस किया।
अगले दिन से ब्राह्मण रोज़ सांप के लिए दूध लाने लगा। धीरे-धीरे सांप की तबीयत सुधरने लगी और वह मजबूत होता गया। कुछ दिनों बाद सांप ने बोलना शुरू किया।
“हे दयालु ब्राह्मण! आपने मेरी जान बचाई है। मैं आपका बहुत आभारी हूं,” सांप ने कहा।
पंडित जी खुश हो गए कि सांप बोल सकता है। उन्होंने कहा, “मैंने तो केवल अपना धर्म निभाया है, बेटा। सभी जीवों की सेवा करना हमारा कर्तव्य है।”
दिन बीतते गए और सांप पूरी तरह स्वस्थ हो गया। अब वह बहुत शक्तिशाली और बड़ा हो गया था। लेकिन अब उसके मन में अहंकार आ गया था।
एक दिन सांप ने पंडित जी से कहा, “अब मैं पूरी तरह ठीक हो गया हूं। मुझे अब आपकी मदद की जरूरत नहीं है। आप मुझे दूध देना बंद कर दें।”
पंडित जी ने कहा, “कोई बात नहीं, बेटा। लेकिन तुम चाहो तो यहीं रह सकते हो। यह तुम्हारा घर है।”
लेकिन सांप के मन में अब दुष्टता आ गई थी। उसने सोचा कि अगर वह इस ब्राह्मण को डरा दे, तो वह उसे और भी अच्छा खाना दे सकता है।
अगले दिन सांप ने अपना फन फैलाया और पंडित जी को डराते हुए कहा, “अब से तुम मुझे रोज़ मिठाई और फल लाकर दोगे, नहीं तो मैं तुम्हें डस लूंगा!”
पंडित जी बहुत दुखी हुए। उन्होंने कहा, “बेटा, मैंने तुम्हारी इतनी सेवा की, और तुम मुझे धमकी दे रहे हो? यह अच्छी बात नहीं है।”
लेकिन सांप नहीं माना। वह रोज़ पंडित जी को परेशान करने लगा। डर के मारे पंडित जी उसे खाना देते रहे।
एक दिन गांव के मुखिया जी पंडित जी के घर आए। उन्होंने देखा कि पंडित जी बहुत परेशान लग रहे हैं। जब उन्होंने पूरी कहानी सुनी तो वे समझ गए।
मुखिया जी ने कहा, “पंडित जी, आपने जो दया दिखाई वह सराहनीय है, लेकिन कभी-कभी दुष्ट लोग हमारी दया का गलत फायदा उठाते हैं। ऐसे में हमें सख्ती दिखानी पड़ती है।”
अगले दिन जब सांप फिर से धमकी देने आया, तो मुखिया जी और गांव के कुछ लोग वहां मौजूद थे। उन्होंने सांप को समझाया कि अगर वह फिर से पंडित जी को परेशान करेगा तो उसे गांव छोड़ना पड़ेगा।
सांप को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने ब्राह्मण से माफी मांगी और कहा, “मुझे खुशी में अहंकार हो गया था। आपने मेरी जान बचाई थी, और मैंने आपके साथ बुरा व्यवहार किया। मैं हमेशा आपका आभारी रहूंगा।”
उसके बाद सांप ने गांव छोड़ दिया और जंगल में चला गया। पंडित जी को शांति मिली।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दया और सेवा करना अच्छी बात है, लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि कुछ लोग हमारी दया का गलत फायदा उठा सकते हैं। हमें दयालु होने के साथ-साथ समझदार भी होना चाहिए। अहंकार किसी भी अच्छे इंसान को बुरा बना सकता है, इसलिए हमें हमेशा विनम्र रहना चाहिए।








