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भगवान विष्णु का अवतार निर्णय – कृष्ण जन्म की कथा

बहुत समय पहले की बात है, जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार का राज था। राक्षसों और दुष्ट राजाओं ने धरती माता को कष्ट में डाल दिया था। मथुरा में कंस नामक एक क्रूर राजा राज करता था, जो अपनी प्रजा पर अत्याचार करता था।

एक दिन धरती माता गाय का रूप धारण करके ब्रह्मा जी के पास पहुंची। उनकी आंखों में आंसू थे और वे बहुत दुखी थीं।

“हे ब्रह्मा जी!” धरती माता ने कहा, “मैं दुष्ट राजाओं के अत्याचार से परेशान हूं। कंस जैसे राक्षस मेरे ऊपर भार बन गए हैं। कृपया मेरी रक्षा करें।”

ब्रह्मा जी ने धरती माता की व्यथा सुनी और तुरंत भगवान शिव के साथ क्षीरसागर में भगवान विष्णु के पास गए। वहां भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विराजमान थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं।

ब्रह्मा जी ने विनम्रता से कहा, “हे नारायण! धरती माता आपकी शरण में आई है। पृथ्वी पर अधर्म बढ़ गया है और दुष्ट शक्तियां निर्दोष लोगों को सता रही हैं।”

भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य आंखें खोलीं और धरती माता की पीड़ा को समझा। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “मैं समझ गया हूं। समय आ गया है कि मैं पुनः धरती पर अवतार लूं।”

तभी आकाशवाणी हुई – “हे देवताओं! चिंता न करें। मैं यदुवंश में जन्म लूंगा और कंस जैसे दुष्टों का नाश करूंगा। मेरा यह अवतार कृष्ण नाम से प्रसिद्ध होगा।”

भगवान विष्णु का अवतार निर्णय सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गए। उन्होंने जाना कि अब धरती पर शांति और धर्म की स्थापना होगी।

इसी समय मथुरा में वासुदेव और देवकी का विवाह हो रहा था। कंस अपनी बहन देवकी को विदा कर रहा था, तभी आकाशवाणी हुई – “हे कंस! जिस देवकी को तू प्रेम से विदा कर रहा है, उसका आठवां पुत्र तेरा काल बनेगा।”

यह सुनकर कंस क्रोधित हो गया और उसने देवकी को मारने के लिए तलवार उठाई। वासुदेव ने हाथ जोड़कर कहा, “हे राजन! देवकी को मत मारिए। मैं वचन देता हूं कि जो भी संतान होगी, उसे आपके सामने प्रस्तुत कर दूंगा।”

कंस ने वासुदेव और देवकी को कारागार में डाल दिया। एक-एक करके देवकी के छह पुत्र हुए और कंस ने सभी को मार डाला। सातवां गर्भ बलराम के रूप में गोकुल में रोहिणी के पास चला गया।

जब आठवां गर्भ आया, तो भगवान विष्णु का अवतार निर्णय पूरा होने का समय आ गया। श्रावण मास की अष्टमी की रात्रि में, जब चारों ओर अंधकार था और मूसलाधार बारिश हो रही थी, भगवान कृष्ण का जन्म हुआ।

जन्म के समय कृष्ण ने अपना चतुर्भुज रूप दिखाया। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे। देवकी और वासुदेव ने भगवान को प्रणाम किया।

भगवान कृष्ण ने कहा, “हे माता-पिता! मैं तुम्हारी रक्षा के लिए आया हूं। अब मुझे तुरंत गोकुल में नंद बाबा के घर पहुंचा दो।”

यह कहकर भगवान ने अपना सामान्य शिशु रूप धारण कर लिया। अचानक कारागार के सभी ताले खुल गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए।

वासुदेव जी ने कृष्ण को एक टोकरी में रखा और सिर पर उठाकर यमुना नदी की ओर चल पड़े। नदी में बाढ़ आई हुई थी, लेकिन जैसे ही वासुदेव जी ने कदम रखा, यमुना जी ने रास्ता दे दिया।

गोकुल पहुंचकर वासुदेव जी ने कृष्ण को यशोदा माता के पास रखा और उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस कारागार आ गए। सुबह जब कंस को पता चला कि देवकी के यहां कन्या का जन्म हुआ है, तो वह उसे मारने आया।

जैसे ही कंस ने कन्या को पकड़ा, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और देवी दुर्गा का रूप धारण करके बोली, “अरे मूर्ख कंस! तेरा काल तो गोकुल में जन्म ले चुका है। अब तेरा नाश निश्चित है।”

इस प्रकार भगवान विष्णु का अवतार निर्णय सफल हुआ और धरती पर भगवान कृष्ण का आगमन हुआ। गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता ने बड़े प्रेम से कृष्ण का पालन-पोषण किया।

कृष्ण ने बचपन से ही अपनी दिव्य लीलाओं से सभी को मोहित किया। उन्होंने पूतना, त्रिणावर्त, बकासुर जैसे राक्षसों का वध किया और गोकुल की रक्षा की।

जब कृष्ण युवा हुए, तो उन्होंने मथुरा जाकर अपने मामा कंस का वध किया और धरती को अत्याचारियों से मुक्त कराया। इस प्रकार भगवान विष्णु का संकल्प पूरा हुआ।

शिक्षा: यह कथा हमें सिखाती है कि जब भी धरती पर अधर्म बढ़ता है, तो भगवान स्वयं अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं। हमें भी सदैव धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए और बुराई का विरोध करना चाहिए। भगवान कृष्ण की यह जन्म कथा हमें यह भी बताती है कि सत्य की हमेशा विजय होती है।

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